एक दीप पर्यावरण के नाम

प्रकृति, एकता और पर्यावरण संरक्षण को समर्पित एक भावपूर्ण कविता एक दीप पर्यावरण के नाम — प्रकृति की रक्षा का संकल्प आओ मिलकर दीप जलाएँ, धरती का हर कोना महकाएँ।  न हो केवल रोशनी घर-आँगन में, एक दीप प्रकृति के नाम जलाएँ। हरी-भरी वसुंधरा की सुंदरता, हम सबकी साँसों का आधार है।  नदियाँ, पर्वत, वन और उपवन, प्रकृति का अनमोल उपहार हैं। क्यों काटें हम वृक्षों की छाया, क्यों नदियों को मैला बनाएँ?  जिस धरती ने जीवन दिया है, उसका ऋण मिलकर क्यों न चुकाएँ? एकता की शक्ति को पहचानें, हर मन में संरक्षण की अलख जगाएँ।  एक हाथ में हो सेवा का संकल्प, दूजे हाथ से पौधे लगाएँ। न जाति का भेद, न भाषा की दीवार, पर्यावरण रक्षा हो सबका विचार।  जब जन-जन मिलकर कदम बढ़ाएगा, तभी स्वच्छ और सुंदर कल आएगा। नन्हे पौधों को वृक्ष बनाएँ, जल की हर बूँद को बचाएँ।  प्लास्टिक मुक्त हो अपना संसार, स्वच्छ हवा से महके हर द्वार। दीपों का पर्व हमें यह सिखलाए, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए।  आओ इस दीपावली एक प्रण उठाएँ, धरती माँ का ऋण निभाएँ। एक दीप हो हरियाली के नाम, एक दीप हो स्वच्छता के नाम।  एक दीप हो जल और जीवन के नाम, एक दीप हो प्रकृति के सम्मान के नाम। क्योंकि पर्यावरण की रक्षा केवल किसी एक की जिम्मेदारी नहीं, यह हम सबका साझा कर्तव्य है। आओ, एकता का दीप जलाएँ, मिलकर अपनी धरती को स्वर्ग बनाएँ। 🌱🪔 ✍️डॉ. श्याम नंदन प्रसाद, पीएच. डी. (प्लांट इकोलॉजी) पूर्व प्राचार्य & पर्यावरणविद्

दीप जलाएँ, मन के अँधियारे मिटाएँ

प्रो. स्मिता शंकर सृजना, बैंगलोरदीपों की पावन बेला आई,खुशियों ने फिर ली अंगड़ाई।आँगन-आँगन दीप जलें,हर चेहरे पर मुस्कान खिलें। मिट्टी का दीप यही सिखाता,खुद जलकर भी रोशनी फैलाता।क्यों न हम…

दीपावली पर घर आए श्रीराम

अब मंदिर बन गया है, श्रीराम का श्रीराम का।अब आगे नम्बर है,घनश्याम का घनश्यामका।। लाखों दीप जलाकर दीवाली,मना रहे हैं लोग।दर्शन कर श्रीराम सिया का, लगा रहे हैं भोग।।सिया राम…

” दीपावली “

दीपावली का त्यौहार है आया ,खुशियों की सौगात है लाया ,अँधेरा दूर भगाया है ,हर घर में उजाला छाया है। झिलमिल करती है हर गली,लगती है जैसे दुल्हन सजी।रंगोली से…

आई दिवाली आई दिवाली

आई दिवाली आई दिवाली,खुशियांँ जीवन में लाई दिवाली।दीप जले तो दिल भी रोशन,प्यार अपनापन लाई दिवाली। भाई बहन और चाचा-चाची, मां-पापा और दादा-दादी।दोस्त रिश्तेदारों के संग, हंँसी खुशी से मनायें…

 आखिर किस बात की दिवाली “

आखिर किस बात की दिवाली “ जब असूंअन बहके सूख चुकें,आंखों में गहरी लाली हैं,होंठों की सिलवटें टूट रही हैं,ढांचा दिखलाती कंगाली हैं,कीचड़ में डूबे काले रंगों में ही,दिखती सुनहरी…

दीपावली पर गाय गोहरी : आदिवासियों की आस्था का पर्व

दीपावली पर गाय गोहरी आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और प्रकृति प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है। झाबुआ, आलीराजपुर, धार, बड़वानी, रतलाम और खरगोन जैसे मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों…

दीपावली के दिये..

जगमग करते दिये जलाओ आजदीपावली के दिये जलाओ आज छोटी सी ज़िंदगी को खूबसूरत बनाओखुशियों से भर दो हर कोना कोना देखो क़ोई भी घर न छूटने पाएश्री राम के…

दीपावली – सिर्फ दीपों का नहीं, अंतस के उजास का पर्व

✍🏻 राष्ट्र गौरव पारस जैन “पार्श्वमणि”पत्रकार दीपावली सिर्फ दीपों का नहीं,अंतस के उजास का पर्व है,बाहर की रोशनी से ज्यादा,भीतर के प्रकाश का पर्व है।एक दीप ऐसा जलाएं,जो अहंकार को…

अंधकार से प्रकाश तक…

घना तिमिर था, एक लौ काँपी थी, मौन के भीतर, इक प्रार्थना जागी थी। सब कुछ बिखरा था, आशा रूठी सी थी, उसी टूटन से, किरण फूटी सी थी। राहें उलझी थीं, कदम डगमगाए थे, अधूरे सपने, नयनों में समाए थे। भय भरा हृदय था, नयन भर आए थे, फिर भी भीतर से, स्वर बोला – चले चलें। करुणा का तेल बना, श्रद्धा की बाती बनी, जली जो लौ, तो भ्रम की रात ढली। एक छोटे दीये से, दिशा बदल चली, अंधियारे ने मानी हार, उजाले की घड़ी चली। अब मैं देह नहीं, मैं एक भाव हूँ, न मैं रात हूँ, मैं ही प्रभात हूँ। जिधर भी जाऊँ, वहीं प्रकाश हूँ, अंधकार से निकल कर, मैं खुद ही प्रकाश हूँ। ये लौ बुझे नहीं, यही प्रार्थना मेरी है, हर बहन, हर साथी तक पहुँचे, यही कामना मेरी है। हम जो कर्म छोड़ जाएँ, वही राह बने सबकी, आने वाली पीढ़ी के लिए, नींव बने ये लौ सबकी। -डॉ माया एस एच

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