अनपढ़ है मेरी माँ

अनपढ़ है मेरी माँ पर दिल मेरा पढ़ लेती है
मेरी हंसी में छुपी उदासी को
एक क्षण में जान लेती है
संस्कारों से किया मेरा लालन-पालन
आचरण में मेरे छवि उसकी झलकती है
मेरे व्यक्तित्व की दृढ़ता यह
उसी की भाव धारा से दमकती है
धैर्य की प्रतिमूर्ति वह
सहनशीलता का पर्याय वह
मन की बात मन में ही दबा रखती है
गृहस्थी की चक्की में सदा पिसती आई
हम पढ़े- लिखों के बीच चुप रहती आई
किसी बात पर बात रखने में भी संकोच करती है
वह माला का धागा है
मोती बिखरने नहीं देती है
रिश्तों की मजबूती यह
उसी के त्याग से फलती है
मां तेरा त्याग समर्पण ममता आज समझ पाई हूँ
जब मैं खुद मां बन पाई हूँ
अपने नन्हे शिशु को गोद में लिए
जब मैं रातों-रातों जगती हूँ
तब तेरी जागी रातें माँ
मेरी आँखों में तरती हैं
संतान मेरी जब उत्पात मचाए
मैं झल्ला उठती हूँ,
धैर्य खो देती हूँ
तब याद आती है तेरी स्नेहपूर्ण मूरत
माँ! तुम यह धीरज कहां से लाती थी?
कैसे हमारी नादानियों पर मुस्कुरा कर रह जाती थी?
कैसे हमारे गुस्से को, नाराजगी को सह जाती थी?
प्रेम का वह कौन सा झरना है
जो हरदम तेरे ह्रदय में झरता रहता है?
उपेक्षा सहकर भी, संतानों पर
तेरी ममता का पहरा रहता है
कभी खत्म ही नहीं होती
सागर से भी असीम तेरी ममता है
माँ तू सबसे ऊपर है
किसी रिश्ते से न तेरी समता है।

                        - कंचन वर्मा, जयपुर राजस्थान।

मेरी माँ श्रीमती मीरा देवी को समर्पित शब्द

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