माॅं के उपकार अगणित

यह जो वक्षस्थल है एक माॅं का,
यह अभयारण्य है शैशव का।
क्रीड़ा किया करता है इसमें,
भविष्य हमारी मानवता का।1।

पिता है बीज तो माॅं धरा है,
बीज कहाॅं बिना धरा उगा है।
देती मानवता को उपहार,
उसका हृदय अंकुरों भरा है।2।

नौ माह वह उदर में रखती,
रक्त-मज्जा से हमको गढ़ती।
देकर जन्म लाती दुनिया में,
पिला दूध हमको सुदृढ़ करती।3।

माॅं होती धुरी परिवार की,
सभी पर अपना, स्नेह वारती।
स्वयम् पर कभी ना देती ध्यान,
परिवार का नित पोषण करती।4।

गोद में माॅं की शिशु निर्भय है,
माॅं है तो शीश वरद अभय है।
माॅं के उपकार अगणित हम पर,
ममता से अशिष्टता अक्षम्य है।5।

राजेश कुमार ‘राज’

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