
एक बेटी की जानिब कुछ एहसास जिनसे पिछले दिनों गुजरी और अब भी उदास हूं हृदय में गहरे कुछ डूबता सा अहसास है।
भाई का फोन आया है
कह रहा है मम्मी बीमार है बहुत
ठीक नहीं है
आजा मिलने
मैं हूं कहती हूं हां नहीं कहती
मन में सोचती हूं
पता है मुझे बुलाने के लिए इमोशनल ब्लैकमेल कर रहा है
भवानी प्रसाद मिश्र की कविता “घर की याद” की पंक्तियां याद आती हैं
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर ख़ुशी का पूर है जो,
और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुःख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें
दौड़ कर गले लग जाना चाहती हूं भाई के
रो लेना चाहती हूं जी भर के
चाहती हूं मम्मी से मिलना
मगर बहुत से बहाने भी हैं न जाने के
कभी कोई विभागीय ड्यूटी आ जाती है
कभी कोई और काम
और इन सब गैर जरूरी कामों के लिए
सबसे जरूरी बात को नजरअंदाज कर देती हूं
फिर भाई का फोन आया है
कह रहा है देख सच में
आज मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है
उसकी आवाज डूबी सी लग रही है
दिल भर आया मैंने कहा कल सुबह निकल जाऊंगी
बस चल रही है
उससे भी तेज मन चल रहा है
पहुंच गई हूं
अस्पताल के बिस्तर पर लेटी है मम्मी
माइनर हार्ट अटैक है
उम्र और कमजोरी है की ऑपरेशन नहीं हो सकता
मम्मी घर आ गई है
शफ़्फाक सफेद चादर ओढ़ने और बिछाने वाली मम्मी
आज गहरे रंग वाली चादर पर सो रही है
अब उन्हें बार बार पेशाब लगता है कई बार निकल भी जाता है
डाइपर पहनाया है बहुत समझाकर…मगर
इतनी दुबली काया है की स्मॉल साइज डाइपर भी ढीला है
और कपड़ों चद्दर का बचाव नहीं कर पाता
ढोल देती हैं पानी बार बार बहाने से
की हम समझें पानी गिरा है
सफेद चादर की जिद नहीं करती
अब मुझे भी डर लगने लगा है सफेद चादर से
डर…..बहुत डर
काजल खत्री “इदा”
