
माँ सृष्टिकाल का मूल,
वह है गुल री कमल,
शीलता में है अव्वल
उसके ॠणी हैं हम बाल।।
माँ संभाले घर-आंगन,
सभ्यता,संन्कृति चमन
सत्य से कलि,सुकुमार
चलती सुचारू परिवार।।
प्रथम गुरू बाल,बाला
देती ज्ञान-दीप आली
निपुणता में परचम री
लहराती वह है मनोहर।।
उफ भी ना करे माही,
चाहे समय प्रतिकूल,
स्मित हास्य,अधर पर
शोभित,सुखद व्यवहार।।
माँ का न कोई सानी
यह माने सारा जगत,
उससे स्वर्ण है संसार
उसके बिना सब है बेकार।।
डॉ. अरुणा अग्रवाल
