
🙏❤️ माॅ ❤️🙏
एक माॅ कैसे तृण-तृण कण-कण टुकड़ों में बंटती,
बच्चों भरतार परिवार सबकी सुनती,
सबकी फ़िक्र कर तिल तिल घुलती,
माॅ की ऑंखें काले घेरे से घिरतीं,
पूछो तो ‘ मैं अच्छी हूॅं ‘
मुस्कुरा कर कहती।
माॅ को वाह वाह तो मुश्किल से मिलती,
पर कंकड़ की भांति पहाड़ी से रोज लुढ़कती,
फिर सब-कुछ भूल सबका कर दूॅं,
ये ही बुनती।
समक्ष देख मैंने जाना भली रीती,
मन कहता ‘आश्चर्यवत्’- परमात्मा, इतनी बड़ी दुनिया एक माॅ की होती !
एक माॅ की कई दुनिया होतीं,
पर ये सच है कि परमात्मा के बाद,
सिर्फ और सिर्फ दुनिया मां से ही होती।
मेरी माॅ कौशल्या अग्रवाल को समर्पित
विहान अग्रवाल पिपरिया मप्र
