
माँ कैसे परिभाषित करु तुम्हें,
क्या हो तुम मेरे लिए कैसे कहूं।
माँ मेरा वजूद है तुमसे
शब्दों में तुम्हें कैसे बांधू।।
मेरा सारांश ही तुम हो…..
अपनी सारी परेशानियां,
आकर तुमसे कह देती हूं।
शायद तुम्हे परेशान कर मै,
चैन की नींद सो लेती हूं।।
अपना गुस्सा अपनी बाते,
सारी तो तुमसे बोल देती हूं ।
कौन सुनेगा,किस पर भरोसा
ये सोच तुम पर आकर ठहर जाती हूं।।
तुम बिन खुद को बहुत अकेला पाती हूं।
मै मजबूत हूँ जब तुम्हे साथ पाती हूं।।
संघर्ष भरे पलो को हंसकर गले लगाती हूं।
माँ मै बड़ी हो गयी हूं,मानती हूँ।।
बहुत सी जिम्मेदारियां हसके उठाती हूं ।
एक माँ होने का फर्ज़ भी
बखूब निभाती हूं।।
पर रिश्तों की बुनियाद पे
खुद को ठगा सा पाती हूं।
इसलिए सुकून पाने आज भी,
तेरे आँचल में आकर छिप जाती हूं।।
शिल्पी जैन
