माँ-एक वरदान

माँ – यह सिर्फ एक शब्द नहीं है बल्की एक वरदान है | मेरी माँ का नाम शोभा है और मैं यह पूरी सत्यता के साथ कह सकती हूँ कि उनसे ही हमारी जिंदगी की शोभा बढ़ती है |
हम चाहे कितनी भी कोशिश कर ल लें लेकिन हम अपनी माँ का कर्ज कभी नहीं उतार सकते | माँ की वो शांत गोदी जिसमें हमने ना जाने कितनी सुकुन भरी नींदे ली हैं , वो भी तब जब हम कुछ बोल भी नहीं सकते थे कि मुझे नींद आ रही है, मुझे सोना है, वगैरह- वगैरह| बिना शब्दों के ही हमारी माँ समझ जाती थी कि हमें कब भूख लगी है, हम कब सोना चाहते हैं, और भी बहुत सारी भावनाएँ |
माँ जीवन के हर पड़ाव में ढाल बन कर खड़ी रहती है ताकि उनके बच्चे पर कोई आँच न आये | मातृ दिवस – यानि माँ का दिन | इस दिन को मनाने का का मतलब यह नहीं है कि हमारे पास माँ के लिए केवल एक ही दिन है बल्की यह दिन तो एक मौका है जिसके माध्यम से हम हर दिन की भावनाओं को प्रकट करने की कोशिश मात्र करते हैं | हालांकि उनके लिए जो कृतज्ञता हम महसूस करते हैं उनको प्रकट करने के लिए केवल एक ही दिन पर्याप्त नहीं है |
हमें अपनी दिनचर्या की छोटी- छोटी कृत्यों से अपनी भावनाओं को प्रकट करते रहना चाहिए क्योंकि रिश्तों को सीचने से वे और भी हरे -भरे और घने हो जाते हैं | हालांकि मेरी मान्यता के अनुसार माँ और बच्चे का यह पवित्र रिश्ता सिचाई का मोहताज नहीं होता, बच्चा अपनी जिंदगी में कितना भी व्यस्त हो, भाग- दौर भरी जिंदगी के ताने-बाने में कितना भी उलझा हो फिर भी उसकी माँ की ममता उसके लिए कभी भी कम नहीं होती | इसके कई जीते-जागते उदहारण आपको अपने समाज मे मिल जायेंगे| जरूरत है तो सिर्फ एक पारखी नज़र की |
अंत में मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि मैं इस वाक्यांश में शत-प्रतिशत विश्वास रखती हूँ कि भगवान खुद हर किसी के पास नहीं रह सकते थे इसलिए उन्होंने माँ – पिताजी बनाए |

  • प्रगति ,परिधि एवं केशव

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!