
चिड़ियों का मृदु कलरव सुनकर, सबके हृदय हर्षाएं हैं।
माँ ने आंँगन के कोने में, कुछ दानें बिख राएं हैं।।
चिड़ियां रानी फुदक- फुदक कर, दाना एक उठाती है।
अपने छोटे बच्चों के हित, लाकर उन्हें खिलाती है।।१।।
मांँ जैसी चिड़ियां भी माँ है, मांँ सभी एक सी होती।
हर मां बच्चों के जीवन में, बस बीज खुशी के बोती।।
माँ नौ मास गर्भ में पाले, पोषण माता से
आता।
माता सबसे बढ़कर जग में, ममता का सागर माता।।२।।
याद आ रहा बचपन अपना, माँ की गोद सहारा था।
आंचल वह ममता का साया, रक्षा कवच हमारा था।
हाथ फेरना सिर पर मांँ का, फिर गोदी
बैठाना था।
सीने से लग कर माता के, निर्भय हो सो जाना था।।३।।
माता आज नहीं है जग में, फिर भी उससे नाता है।
जब भी कोई दुख आ जाए ,मांँ की याद दिलाता है।
उम्र किसी की कुछ हो जाए, माँ को भूल न पाए हैं।
पीड़ा में जब हम होते हैं, याद मात की आए हैं।।४।।
माँ सुख की ठंडी छाया है, तपी धूप आंचल पाया।
सारे खेल खिलौने छोड़ें, बालक माँ गोदी आया।
दुनिया का सब सुख फीका है, बच्चों की सुन किलकारी।
एक मृदु मुस्कान पर माता, अपने सारे सुख वारी।।५।।
उषा उमेश गुप्ता “उमा” बेंगलुरु
