
गोरा काला और गेंहुआ,रंग चमकता है।
माँ का मुखड़ा कैसा भी हो,सुन्दर लगता है।
आँखों में ममता का सागर,लहराता रहता।
भाल बिंदु तो पूर्ण चंन्द्र की,शोभा हर लेता।
उलझे बालों में सिंदूरी,तेज दमकता है।
माँ का मुखड़ा….।
गृह प्रबन्ध पालन बच्चों का,ध्यान सदा रखती।
बाबा के वेतन से खर्चा,समझ -समझ करती।
अपने लिये कहाँ कुछ लेती संशय रहता है।
माँ का मुखड़ा…..।
लाभ रोग में मिले बाल को,जाये शीघ्र वहाँ।
गोद सुलाये जागे रैना,है अवकाश कहाँ।
कब सोती कब वो उठ जाती,पता न चलता है।
माँ का मुखड़ा……।
सुख देती संकट हर लेती,यह पावन नाता।
आँचल में त्रैलोक्य सँवारे,माँ अंबे माता।
नमन ईश माँ है धरती पर,मन भर आता है।
माँ का मुखड़ा कैसा भी हो सुन्दर लगता है।
पुष्पा शर्मा’कुसुम’
