
माँ, तुम्हारी हर बात मैंने शब्द-दर-शब्द निभाई है,
तेरे संस्कारों की लकीरें आज भी मेरी सांसों में समाई हैं।
जहाँ झूठ की आँधी चली, वहाँ भी मैंने सत्य का दीप जलाया,
अपनी इज्ज़त दाँव पर रख, हर स्त्री का मान बचाया।
जब समय ने परखा मुझे अग्नि-पथ पर,
मैंने तेरी ममता को ढाल बनाया उस ज्वालामुखी सफ़र पर।
तेरी गोद की कोमलता ने दिया साहस इस रण में,
कि झुकूँ नहीं अन्याय के आगे, रहूँ अडिग हर क्षण में।
लोग हँसे, ताने दिए, पर मैंने मौन साधा,
क्योंकि तूने सिखाया था — “बेटी, सच्चा धर्म है नारी का साधना।”
हर अपमान को धैर्य से मैंने मौन में सहेजा,
तेरे नाम की लाज रखी, यही मेरा सबसे बड़ा प्रजेता।
मेरे आँसू नहीं कमजोरी, ये मेरी तपस्या का गहना हैं,
हर घाव मेरी गवाही है — कि मैं तेरी ही बेटी रहना हूँ।
तेरे आशीष की छाया में मैं हर अन्याय से लड़ी,
तेरी दी हुई शक्ति से मैं अंधेरों में भी जली।
माँ, अगर लोग पूछें कौन हूँ मैं — तो बस इतना कहना,
“वह मेरी बेटी है, जिसने सत्य को अपने भीतर गढ़ा।”
उसने अपनी अस्मिता को जग की इज्ज़त से जोड़ा,
हर स्त्री को माँ समझकर, उसका मान थामा, उसका आँचल ओढ़ा।
रचयिता – डॉ राखी परम सवालानी
