
मां सृष्टि है मां वृष्टि है
मां में अद्भुत शक्ति समाई
मां प्रेम का सागर मीठा
संबंधों की मां ठकुराई ।
मां साकार रूप ईश्वर का
मां त्याग की मूर्ति जग में
मां शब्द नहीं केवल भाषा का
स्वर्ग जिसके हर पग पग में ।
जग के दर्शन हो ना पाते
जो जग में ना होती माता
सुख मां के आंचल का ऐसा
पाना चाहते स्वयं विधाता।
मां यशोदा मां कौशल्या
मां बन जाती जीजाबाई
जैसा चाहे बना दे बालक
मां में अद्भुत कला समाई ।
मां आधार जगत का प्यारे
जिस पर टिके हैं चांद सितारे
मां बिन सूना सूना सब कुछ
मां है तो दिन-रात हमारे ।
- व्यग्र पाण्डे
