
माँ वही खड़ी रह जाती है दहलीज़ पर,
बच्चे अपने सपनों की राह निकल जाते हैं।
कोई शहरों में खो जाता है,
कोई रिश्तों में उलझ जाता है,
और माँ…
बस चौखट से आँखें टिकाए रह जाती है।
जिस आँगन में उसकी हँसी गूंजती थी,
वहाँ अब सन्नाटा चाय पीता है।
दीवारों पर टंगी तस्वीरों से
वो धीरे-धीरे बातें करती है,
जैसे हर फोटो में बचपन अब भी जिंदा हो।
वो हर शाम दरवाज़ा थोड़ा खुला रखती है,
कि शायद कोई आवाज़ आए—
“माँ, खाना दे दो…”
पर आवाज़ें अब मोबाइल में रहती हैं,
घर तक कम ही आती हैं।
उसके हाथों की रोटियाँ
अब भी पहले जैसी नरम होती हैं,
बस खाने वाले हाथ दूर हो गए हैं।
वो आज भी सबकी पसंद याद रखती है,
पर उसकी पसंद पूछने वाला
अब कोई नहीं बचा।
माँ कभी शिकायत नहीं करती,
बस मंदिर में दिया जलाकर
बच्चों की सलामती माँग लेती है।
अपने हिस्से की नींद,
अपने हिस्से की खुशियाँ,
सब चुपचाप उनके नाम कर देती है।
और एक दिन…
जब बच्चे लौटते हैं थककर,
दुनिया की भीड़ से हारकर,
तब समझ आता है—
घर सिर्फ ईंटों से नहीं बनता,
घर तो माँ के इंतज़ार से बनता है।
मगर तब तक
माँ की आँखों के नीचे
इंतज़ार की लंबी रातें उतर चुकी होती हैं…
और वो अब भी
उसी दहलीज़ पर खड़ी होती है,
जहाँ से उसने बच्चों को
पहली बार स्कूल जाते देखा था।
लेखिका
साधना सेठी
