“माँ: सृजन का आदिम शोर”

“माँ: सृजन का आदिम शोर”​माँ कोई प्रार्थना नहीं, जिसे सिर्फ संकट में दोहराया जाए,
वो तो वो ‘आदिम शोर’ है, जिससे सन्नाटा भी थर्रा जाए।
जिसे दुनिया ‘ममता’ का मखमल समझकर ओढ़ लेती है,
दरअसल माँ वो ‘आग’ है, जो पत्थरों को भी मोड़ देती है।
​माँ सृजन की ‘क्रूरता’ है—
क्योंकि जन्म देना कोई कोमल अहसास नहीं, एक युद्ध है,
अपने ही अंश को खुद से अलग करना, सबसे बड़ा ‘विरुद्ध’ है।
हमने माँ को ‘चूल्हे’ तक सीमित कर अपनी जीत मान ली,
पर वो तो वो ‘धुरी’ थी, जिसने कायनात की हर हरकत पहचान ली।
​वो ‘समय’ का पर्याय है—
माँ थकी नहीं, वो रुकी नहीं, वो महज़ ढलती रही,
एक नस्ल को मुकम्मल करने के लिए, वो खुद में जलती रही।
उसे ‘मजबूर’ कहना तुम्हारी बुद्धि का दिवालियापन है,
माँ तो वो ‘साम्राज्य’ है, जिसका हर घर एक छोटा सा अंश है।
​मत ढूंढो उसे पुराने उपमाओं और घिसे हुए अलंकारों में,
माँ तो वो ‘अघोषित सत्य’ है, जो चीख रहा है अखबारों में।
वो त्याग की मूर्ति नहीं, वो ‘अस्तित्व का अधिकार’ है,
इस बेरुखी दुनिया में, माँ ही इकलौता ‘ठोस आधार’ है।

शिल्पा साहा
माता जी का नाम -संध्या साहा

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