
मां का व्याख्यान शब्दों में हो नहीं सकता,
मां सरीखा दुनिया में कोई हो नहीं सकता,
मां के दुलार की कोई बराबरी कर नहीं सकता,
मां जैसा हितैषी कोई मिल नहीं सकता।
अपने आप को खोकर मां ने तराशा है मुझे,
हर ग़म की धूप से मां ने उबारा है मुझे।
जमाने के साथ चलना मां ने सिखाया है मुझे,
जमाने की हर बुरी नजर से मां ने बचाया है मुझे
हर पल,हर क्षण मेरी फिक्र मां को सताती है,
खुद की सुध बुध खोकर मां मेरे कल को सजती है।
जीवन देकर भी तेरे उपकार को चुका ना पाऊं मै,
तुझे कष्ट में देखकर खुद से कैसे नैन milau मैं,
मां के आगे दर्जा ईश्वर का भी कुछ नहीं,
इस दुनियां में मेरी मां से बढ़कर कुछ नहीं।।
मेरी मां श्रीमती मधु अग्रवाल को समर्पित।।
नीलिमा सिंघल
