मेरी माॅं!

करुण हृदय ममता की मूरत
शिशु मानव का सारा संसार;
गर्भ नाल से पंचभूत धरा पर
ब्रह्म सृजन अनुपम उपहार।

माॅं माई मम्मा के संबोधन से
रहे संतान से ध्वनिक जुड़ाव;
प्रथम गुरु माॅं से सीखे बचपन
स्वर व्यंजन लेख,जोड़-घटाव।

उंगली पकड़ सिखाया चलना
सिखाई तूतली बोली का बोल;
स्वप्न लोक घुमाती परियों की
स्नेहिल थपकी में मीठा घोल।

शिशु अबोध बड़ा हो कर यद्यपि
माॅं की नज़र में सदा बच्चा होता;
दर्द हृदय का सदा बांटता माॅं से
माॅं के आंचल में छुप चुप रोता।

ढ़ाढस पाये माॅं की वक्षस्थल से
कुरुक्षेत्र की रण में है डट जाता;
हो कर विजित कर्मयोगी मानव
अपनी प्यारी माॅं की गाथा गाता।

-अंजनीकुमार तिवारी’सुधाकर’

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